इतना गुस्सा है के उफ्फ
उस नंगे बच्चे के फटे पैरोंपर भी दया नहीं आती उसे
जो तपती सडक पर
गाडी के पिछे भागता है
और उस बुढी औरत पे भी नहीं
जो चार दिन ये सिर्फ पानी पी के जी रही है
अब तो उठ भी नहीं सकती
कुछ घटों की मेहमान लगती है
पेड मुरझा रहे है
पंछी चुप है
जमीं और आंसमां मानो उबलते लावा की तरह हो गया है
सन्नाटा छाया है
सिर्फ सुरज की चिडचिडी आवाज सुनायी दे रही है
क्युं खफा हो
इतना गुस्सा क्युं करते हो
किसी दिन हार्टअट्याक आ जायेगा
अपनी भुल पता तो चली है
सुधर भी जायेंगे
थोडा वक्त तो दो
इन्सान है, तुम्हारे बच्चे हैं
थोडी मुहलत दे दो