Sunday, 23 August 2015

जाने कितनी सदियोंसे खड़ा था बरगद का वो पेड़
उस बूढ़ी औरत की तरह
जो उसी पेड़ के निचे बैठके इमली के गोले और अमरुद बेचा कराती थी
जैसे तैसे माँ से पैसे लेकर
इमली लेने दौड़ती थी

मुझे सामने देख
उसके चेहरेपर हंसी आती थी 
अपने झुर्राये हाथोंमें मेरे हाथ पकड़ना
उसे अच्छा लगता था
मेरे कॉपियोंसे जादा तो
उसके हाथोंपें रेषांये थी
मेरे चेहरेपे अपना हाथ फेरते
उसकी आँखोंमे आँसू आते थे

इमली के गोले के साथ
मेरे हाथ में अमरुद भी थामा करती थी

बरसोँ बाद मार्केट में अमरुद से भरी टोकरी दिखी
तब उसकी याद आयी
यांदें भी अजीब होती है
जब उनकी मर्जी हो तभी आती है

माँ से पूछा तो पता चला
वो मर गयी
और वो बरगद का पेड़ भी

किसी बारिश में उसकी टहनी पड़ी थी
उस बूढी औरत के सर पर
बस्तीवालोंने तो वो पेड़ ही काट डाला

खून का बदल खून
यही जमाना है अब 

Thursday, 20 August 2015


तुम्हारी खुशबु का इत्तर ढुंढ़ रही थी
हर जगह, हर दुकान
कहीं तो मिल जाये
और ये इंतज़ार ख़त्म हो जाये

पर किसीने इसका नाम ही नहीं सुना था
बड़ा अचरज हुआ
इतनी प्यारी ख़ुशबू और
किसीने नाम भी सुना नहीं?
मैं भी कितनी बेवक़ूफ़ हुँ
तुम्हारी ख़ुशबू दुकानों में थोडेही मिलेगी?

सीने से लगाकर जब तुम्हारी सांसे मेरे होंठों को छु लेंगी
तुम्हारी ख़ुशबू मुझमें बसती चली जायेगी

Monday, 3 August 2015

एक दौड़ लगी है ,चीज़े पाने की
हर कोई किसी न किसी चीज़ के पीछे दौड़ रहा है
मैं भी उन्हीं में से हुँ
कुछ पाने के लिए दौड़ रही हुँ
न जाने वो क्या चीज़ है जो मुझे इतना दौड़ा रही है
आधी ज़िन्दगी बीत चुकी है
पर अबतक मंज़िल दिखाई नहीं दे रही
रास्ता और भी लम्बा हो रहा है
अब तो गला भी सुख रहा है मेरा
प्यास लगी है , बड़ी जोर की
कुछ बारिश की बुँदे  या दूर से ही मंज़िल का नजारा भी काफी होगा
एक तलब लगी है
न जाने ये रास्ता कब खत्म होगा
न जाने ये प्यास बुज़ेगी 

Tuesday, 28 July 2015

आज भी शाम खाली है
पुरे दिन की तरह,
तुम्हारे आने की हर आहट झुठी है
तुम्हारे वादों की तरह,
काश वो लम्हा पकड़ पाती,
जब तुमने कहा था,
'कल मिलते है '
शायद उस नील आसमां के मालिक ने भी सुन लिया
अनाडी कहीं का ,
तुमने उससे नहीं मुझसे कहा था
समझा ही नहीं वो

Sunday, 26 July 2015

पलभर

तुमसे मिलनेकी चाहत बड़ी सख़्त थी
लगता  था नहीं मिलुंगी तो दुनिया डूब जाएगी
कितने दिन , कितने साल ऐसेही गुज़र गये
न हम मिले , न दुनिया डुबी

पर जब मिलनेका वक्त आया
तो मानो जान गले में अटक गयी
दो पल का ही मिलाना था
उसमें दुनिया इधर की उधर हो गई

मेरा वक्त तो अभीभी वहीं ठेहरा है   
 उन्ही दो पलोंमें 

अनघा 
   

Wednesday, 15 July 2015

वक्त

 किसी दिन वक्त ने दरवाजे पर दस्तक दे दी
कुछ भूले लम्हे , जो मेरे पास पड़े थे, लेने आया था
उसे अंदर लिया
चाय बिस्कुट खिलाये
पर माना नहीं
तुम्हारी यादें कैसे देती उसे ?
पर उसका हिसाब अधूरा था
उसके KRA का सवाल था
आखिर हमने मांडवली की
मैंने तुम्हारे लम्हे उसे उधार दे दिए
और ब्याज़ में बचपन की कुछ यादें माँगी
सस्ता पड़ा सौदा मुज़े
तुम्हारी यादोंसे मुरज़ाये दिल में
अब मेरा बचपन भी रेहता हैं
हँसता खेलता मेरा बचपन

--अनघा


Sunday, 3 May 2015

धुपछाँव का खेल खेलते सुरज ने आँखे बडी करली है
इतना गुस्सा है के उफ्फ

उस नंगे बच्चे के फटे पैरोंपर भी दया नहीं आती उसे
जो तपती सडक पर 
गाडी के पिछे भागता है

और उस बुढी औरत पे भी नहीं 
जो चार दिन ये सिर्फ पानी पी के जी रही है
अब तो उठ भी नहीं सकती
कुछ घटों की मेहमान लगती है

पेड मुरझा रहे है
पंछी चुप है
जमीं और आंसमां मानो उबलते लावा की तरह हो गया है
सन्नाटा छाया है
सिर्फ सुरज की चिडचिडी आवाज सुनायी दे रही है

क्युं खफा हो
इतना गुस्सा क्युं करते हो 
किसी दिन हार्टअट्याक आ जायेगा

अपनी भुल पता तो चली है
सुधर भी जायेंगे
थोडा वक्त तो दो
इन्सान है, तुम्हारे बच्चे हैं
थोडी मुहलत दे दो





Tuesday, 21 April 2015

बस एक दिन

नदिया के किनारे बसे महलोंमे ख़्वाब बसा करते थे
ऊँचे पेड़ोंके पीछे से झाँकते थे
लुकाछुपी खेला करते थे
कभी नदिया किनारे खेलते दिखाई पड़ते थे
अमरुद के पेड़ से चोरी करते हुए भी देखा था उन्हें
दोस्तोंके बीच अनबन होती थी और चुटकियोंमें ख़तम भी होती थी
सुबह की किरणे उन ख्वाबोंको सेहलाती थी
बारिश उन्हें भिगोती थी
सर्दियों के मौसम में अलाव जलाकर उनमे भुट्टे सेखंते भी देखा है

लग रहा था सब ऐसे ही हसीं होगा
कहाँ जानते थे बचपन के ख्वाब बचपन में ही छुट़ जाया करते है

वक़्त के साथ ख़्वाब भी बड़े हो गए
नया शहर , नयी जगह के हो गए
अब नदी किनारे दिल नहीं लगता उनका
न पेड़ के अमरुद तोडना अच्छा लगता है
अब तो ख्वाब भी स्टेटस  के आते है
अब न जाने  रात को नींद क्यों नहीं आती

कभी वक़्त मिले तो पकड़लो उन ख्वाबोंको जो बचपन में छुट गए थे
एक दिन गुजरके देखो उनके संग
बस एक दिन