Tuesday, 28 July 2015

आज भी शाम खाली है
पुरे दिन की तरह,
तुम्हारे आने की हर आहट झुठी है
तुम्हारे वादों की तरह,
काश वो लम्हा पकड़ पाती,
जब तुमने कहा था,
'कल मिलते है '
शायद उस नील आसमां के मालिक ने भी सुन लिया
अनाडी कहीं का ,
तुमने उससे नहीं मुझसे कहा था
समझा ही नहीं वो

Sunday, 26 July 2015

पलभर

तुमसे मिलनेकी चाहत बड़ी सख़्त थी
लगता  था नहीं मिलुंगी तो दुनिया डूब जाएगी
कितने दिन , कितने साल ऐसेही गुज़र गये
न हम मिले , न दुनिया डुबी

पर जब मिलनेका वक्त आया
तो मानो जान गले में अटक गयी
दो पल का ही मिलाना था
उसमें दुनिया इधर की उधर हो गई

मेरा वक्त तो अभीभी वहीं ठेहरा है   
 उन्ही दो पलोंमें 

अनघा 
   

Wednesday, 15 July 2015

वक्त

 किसी दिन वक्त ने दरवाजे पर दस्तक दे दी
कुछ भूले लम्हे , जो मेरे पास पड़े थे, लेने आया था
उसे अंदर लिया
चाय बिस्कुट खिलाये
पर माना नहीं
तुम्हारी यादें कैसे देती उसे ?
पर उसका हिसाब अधूरा था
उसके KRA का सवाल था
आखिर हमने मांडवली की
मैंने तुम्हारे लम्हे उसे उधार दे दिए
और ब्याज़ में बचपन की कुछ यादें माँगी
सस्ता पड़ा सौदा मुज़े
तुम्हारी यादोंसे मुरज़ाये दिल में
अब मेरा बचपन भी रेहता हैं
हँसता खेलता मेरा बचपन

--अनघा