Sunday, 3 May 2015

धुपछाँव का खेल खेलते सुरज ने आँखे बडी करली है
इतना गुस्सा है के उफ्फ

उस नंगे बच्चे के फटे पैरोंपर भी दया नहीं आती उसे
जो तपती सडक पर 
गाडी के पिछे भागता है

और उस बुढी औरत पे भी नहीं 
जो चार दिन ये सिर्फ पानी पी के जी रही है
अब तो उठ भी नहीं सकती
कुछ घटों की मेहमान लगती है

पेड मुरझा रहे है
पंछी चुप है
जमीं और आंसमां मानो उबलते लावा की तरह हो गया है
सन्नाटा छाया है
सिर्फ सुरज की चिडचिडी आवाज सुनायी दे रही है

क्युं खफा हो
इतना गुस्सा क्युं करते हो 
किसी दिन हार्टअट्याक आ जायेगा

अपनी भुल पता तो चली है
सुधर भी जायेंगे
थोडा वक्त तो दो
इन्सान है, तुम्हारे बच्चे हैं
थोडी मुहलत दे दो





No comments:

Post a Comment