Tuesday, 21 April 2015

बस एक दिन

नदिया के किनारे बसे महलोंमे ख़्वाब बसा करते थे
ऊँचे पेड़ोंके पीछे से झाँकते थे
लुकाछुपी खेला करते थे
कभी नदिया किनारे खेलते दिखाई पड़ते थे
अमरुद के पेड़ से चोरी करते हुए भी देखा था उन्हें
दोस्तोंके बीच अनबन होती थी और चुटकियोंमें ख़तम भी होती थी
सुबह की किरणे उन ख्वाबोंको सेहलाती थी
बारिश उन्हें भिगोती थी
सर्दियों के मौसम में अलाव जलाकर उनमे भुट्टे सेखंते भी देखा है

लग रहा था सब ऐसे ही हसीं होगा
कहाँ जानते थे बचपन के ख्वाब बचपन में ही छुट़ जाया करते है

वक़्त के साथ ख़्वाब भी बड़े हो गए
नया शहर , नयी जगह के हो गए
अब नदी किनारे दिल नहीं लगता उनका
न पेड़ के अमरुद तोडना अच्छा लगता है
अब तो ख्वाब भी स्टेटस  के आते है
अब न जाने  रात को नींद क्यों नहीं आती

कभी वक़्त मिले तो पकड़लो उन ख्वाबोंको जो बचपन में छुट गए थे
एक दिन गुजरके देखो उनके संग
बस एक दिन


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