यादोंकी गठरी ढूँढी आज
खोल के देखा तो बहुत कुछ मिला
कुछ कंचे
कुछ पेन्सिलें
कुछ काग़ज़
कुछ ख़त
कुछ रंग
कुछ बिछड़े दोस्त
कुछ कहानियाँ
बहोत कुछ जमा कर लिया है
आज सब एक बार थोड़ा थोड़ा देख लिया
दोस्तोंके साथ बातें कर ली
अचरज के साथ वो भी बोल बैठे
अरे कहाँ रेहती है आजकल ?
ना फ़ोन ना मेसिज
मैंने कहा
मेरी गठरी नहीं मिल रही थी
आज मिली है
थोड़ी धुल जमी थी , साफ़ की
वो सब हंसने लगे
पगली कहीं की
कहीं यादों की गठरी भी खोती है??
मैंने हंस कर वापस सब गठरी में बंद कर दिया
अब ध्यान से रखी है
जब बचपन की याद आएगी तब वापस खोल दूँगी
यादोंकी गठरी
अनघा
Nice poem
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