Tuesday, 19 May 2020

यादोंक़ी ग़ठरी

यादोंकी गठरी ढूँढी आज 
खोल के देखा तो बहुत कुछ मिला 

कुछ कंचे
कुछ पेन्सिलें
कुछ काग़ज़
कुछ ख़त 
कुछ रंग 
कुछ बिछड़े दोस्त 
कुछ कहानियाँ 
बहोत कुछ जमा कर लिया है
आज सब एक बार थोड़ा थोड़ा देख लिया 
दोस्तोंके साथ बातें कर ली 
अचरज के साथ वो भी बोल बैठे 
अरे कहाँ रेहती है आजकल ?
ना फ़ोन ना मेसिज 
मैंने कहा 
मेरी गठरी नहीं मिल रही थी 
आज मिली है 
थोड़ी धुल जमी थी , साफ़ की 
वो सब हंसने लगे 
पगली कहीं की 
कहीं यादों की गठरी भी खोती है??

मैंने हंस कर वापस सब गठरी में बंद कर दिया 
अब ध्यान से रखी है 
जब बचपन की याद आएगी तब वापस खोल दूँगी 
यादोंकी गठरी 

अनघा 

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