Monday, 4 January 2016

एक तरसता लम्हा बहोत कुछ सिखा गया
कुछ हसीन पलोंको पीछे छोड़ता गया
वक़्त बेमानी सा हो गया
जीना बेमतलब हो गया 
कुछ उम्मीद बाक़ी थी
तुम्हारे साथ चलनेकि आस थी 
सब कुछ साथ ले गया
एक तरसता लम्हा बहोत कुछ सिखा गया 

एक पल के लिए लगा मानो दुनिया हाथ में आ गयी
चाँद भी हाँथोंमें थम गया
पर वक़्त का पलड़ा भारी हो गया 
देखते देखते वक़्त की रेत हाथोंसे छूटती गयी 
दिनोंका हिसाब लम्होमे में पलट गया
एक तरसता लम्हा बहोत कुछ सिखा गया 
--अनघा

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